गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ-बहार चले


गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ-बहार चले 
चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले 
क़फ़स उदास है यारो सबा से कुछ तो कहो 
कहीं तो बहर-ए-ख़ुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले 
कभी तो सुब्ह तिरे कुंज-ए-लब से हो आग़ाज़ 
कभी तो शब सर-ए-काकुल से मुश्क-बार चले 
बड़ा है दर्द का रिश्ता ये दिल ग़रीब सही 
तुम्हारे नाम पे आएँगे ग़म-गुसार चले 
जो हम पे गुज़री सो गुज़री मगर शब-ए-हिज्राँ 
हमारे अश्क तिरी आक़िबत सँवार चले 
हुज़ूर-ए-यार हुई दफ़्तर-ए-जुनूँ की तलब 
गिरह में ले के गरेबाँ का तार तार चले 
मक़ाम 'फैज़' कोई राह में जचा ही नहीं 
जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले 

मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग 

मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात 

तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है 

तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात 

तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है 

तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए 

यूँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाए 

और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा 

राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा 

अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म 

रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए 

जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म 

ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए 

जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से 

पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से 

लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे 

अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे 

और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा 

राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा 

मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग 

चंद रोज़ और मिरी जान

चंद रोज़ और मिरी जान फ़क़त चंद ही रोज़ 

ज़ुल्म की छाँव में दम लेने पे मजबूर हैं हम 

और कुछ देर सितम सह लें तड़प लें रो लें 

अपने अज्दाद की मीरास है माज़ूर हैं हम 

जिस्म पर क़ैद है जज़्बात पे ज़ंजीरें हैं 

फ़िक्र महबूस है गुफ़्तार पे ताज़ीरें हैं 

अपनी हिम्मत है कि हम फिर भी जिए जाते हैं 

ज़िंदगी क्या किसी मुफ़लिस की क़बा है जिस में 

हर घड़ी दर्द के पैवंद लगे जाते हैं 

लेकिन अब ज़ुल्म की मीआद के दिन थोड़े हैं 

इक ज़रा सब्र कि फ़रियाद के दिन थोड़े हैं 

अरसा-ए-दहर की झुलसी हुई वीरानी में 

हम को रहना है पे यूँही तो नहीं रहना है 

अजनबी हाथों का बे-नाम गिराँ-बार सितम 

आज सहना है हमेशा तो नहीं सहना है 

ये तिरे हुस्न से लिपटी हुई आलाम की गर्द 

अपनी दो रोज़ा जवानी की शिकस्तों का शुमार 

चाँदनी रातों का बेकार दहकता हुआ दर्द 

दिल की बे-सूद तड़प जिस्म की मायूस पुकार 

चंद रोज़ और मिरी जान फ़क़त चंद ही रोज़

ज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा - हबीब जालिब

ज़ुल्मत को ज़िया - हबीब जालिब 

ज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना 
पत्थर को गुहर दीवार को दर कर्गस को हुमा क्या लिखना 

इक हश्र बपा है घर में दम घुटता है गुम्बद-ए-बे-दर में 
इक शख़्स के हाथों मुद्दत से रुस्वा है वतन दुनिया-भर में 

ऐ दीदा-वरो इस ज़िल्लत को क़िस्मत का लिखा क्या लिखना 
ज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना 

ये अहल-ए-हश्म ये दारा-ओ-जम सब नक़्श बर-आब हैं ऐ हमदम 
मिट जाएँगे सब पर्वर्दा-ए-शब ऐ अहल-ए-वफ़ा रह जाएँगे हम 

हो जाँ का ज़ियाँ पर क़ातिल को मासूम-अदा क्या लिखना 
ज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना 

लोगों पे ही हम ने जाँ वारी की हम ने ही उन्ही की ग़म-ख़्वारी 
होते हैं तो हों ये हाथ क़लम शाएर न बनेंगे दरबारी 

इब्लीस-नुमा इंसानों की ऐ दोस्त सना क्या लिखना 
ज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना 

हक़ बात पे कोड़े और ज़िंदाँ बातिल के शिकंजे में है ये जाँ 
इंसाँ हैं कि सहमे बैठे हैं खूँ-ख़्वार दरिंदे हैं रक़्साँ 

इस ज़ुल्म-ओ-सितम को लुत्फ़-ओ-करम इस दुख को दवा क्या लिखना 
ज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना 

हर शाम यहाँ शाम-ए-वीराँ आसेब-ज़दा रस्ते गलियाँ 
जिस शहर की धुन में निकले थे वो शहर दिल-ए-बर्बाद कहाँ 

सहरा को चमन बन कर गुलशन बादल को रिदा क्या लिखना 
ज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना 

ऐ मेरे वतन के फ़नकारो ज़ुल्मत पे न अपना फ़न वारो 
ये महल-सराओं के बासी क़ातिल हैं सभी अपने यारो 

विर्से में हमें ये ग़म है मिला इस ग़म को नया क्या लिखना 
ज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना 






मैं ने उस से ये कहा - हबीब जालिब

मैं ने उस से ये कहा - हबीब जालिब 

मैं ने उस से ये कहा 

ये जो दस करोड़ हैं  

जहल का निचोड़ हैं  

उन की फ़िक्र सो गई  

हर उमीद की किरन 

ज़ुल्मतों में खो गई 

ये ख़बर दुरुस्त है 

उन की मौत हो गई 

बे-शुऊर लोग हैं 

ज़िंदगी का रोग हैं 

और तेरे पास है 

उन के दर्द की दवा 

मैं ने उस से ये कहा 

तू ख़ुदा का नूर है 

अक़्ल है शुऊर है 

क़ौम तेरे साथ है 

तेरे ही वजूद से 

मुल्क की नजात है 

तू है महर-ए-सुब्ह-ए-नौ 

तेरे बाद रात है 

बोलते जो चंद हैं 

सब ये शर-पसंद हैं 

उन की खींच ले ज़बाँ 

उन का घोंट दे गला 

मैं ने उस से ये कहा 

जिन को था ज़बाँ पे नाज़ 

चुप हैं वो ज़बाँ-दराज़ 

चैन है समाज में 

बे-मिसाल फ़र्क़ है 

कल में और आज में 

अपने ख़र्च पर हैं क़ैद 

लोग तेरे राज में 

आदमी है वो बड़ा 

दर पे जो रहे पड़ा 

जो पनाह माँग ले 

उस की बख़्श दे ख़ता 


मैं ने उस से ये कहा 

हर वज़ीर हर सफ़ीर 

बे-नज़ीर है मुशीर 


वाह क्या जवाब है 

तेरे ज़ेहन की क़सम 

ख़ूब इंतिख़ाब है 

जागती है अफ़सरी 

क़ौम महव-ए-ख़्वाब है 

ये तिरा वज़ीर-ख़ाँ 

दे रहा है जो बयाँ 

पढ़ के उन को हर कोई 

कह रहा है मर्हबा 


मैं ने उस से ये कहा 

चीन अपना यार है 

उस पे जाँ-निसार है 

पर वहाँ है जो निज़ाम 

उस तरफ़ न जाइयो 

उस को दूर से सलाम 

दस करोड़ ये गधे 

जिन का नाम है अवाम 

क्या बनेंगे हुक्मराँ 

तू 'यक़ीं' है ये 'गुमाँ' 

अपनी तो दुआ है ये 

सद्र तू रहे सदा 

मैं ने उस से ये कहा