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ब्रतोल्त ब्रेख्त - उद्धरण



‘‘सभी देशों की मेहनतकश जनता के हित में, लेखकों को एक लड़ा़ाकू यथार्थवाद को अपनाने के लिए ललकारा जाना चाहिए। केवल एक समझौताविहीन यथार्थवाद ,जो  सच्चाई पर, यानी शोषण -उत्पीड़न पर पर्दा डालने के सभी प्रयासों से जूझेगा, केवल वही शोषण और उत्पीड़न की कड़ी निन्दाकर उनकी कलई खोल सकता है। 

                                                                                                             - ब्रतोल्त ब्रेख्त                         






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मैं उपकार में यकीन नहीं करता - एदुवार्दो गालेआनो



"मैं उपकार में यकीन नहीं करता। मुझे एकता में यकीन है। उपकार सिर पर खड़ा होता है, इसलिए यह अपमानजनक है। यह ऊपर से नीचे आता है।  एकता बराबरी के स्तर पर होती है। यह दूसरों का सम्मान करती है और दूसरों से सीखती है। मैनें दूसरे लोगों से बहुत कुछ सीखा है। हर दिन मैं सीख रहा हूँ। मैं एक जिज्ञासु इनसान हूँ, हमेशा दूसरे लोगों को पढ़ता रहता हूँ, उनकी आवाजें, उनके रहस्य, उनकी कहानियाँ, उनके रंग। मैं उनके शब्द चुराता हूँ, शायद मुझे गिरफ्तार किया जाना चाहिए।"

                                                                -एदुवार्दो गालेआनो






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विद्यार्थी - एदुआर्दो गालेआनो

विद्यार्थी

दिन-प्रतिदिन बच्चों को बचपन के अधिकार से दूर किया जा रहा है। इस अधिकार की हँसी उड़ाते सच अपनी सीखें हम तक रोजाना पहुँचाते हैं। हमारी दुनिया धनी बच्चों को
यूँ देखती है मानो वे कोई चलती-फिरती तिजोरी हों! और फिर होता यह है कि ये बच्चे असल जिन्दगी में भी खुद को रुपया-पैसा ही समझने लग जाते हैं। दूसरी ओर, यही दुनिया
गरीब बच्चों को कूड़ा-कचरा समझते हुए उन्हें घूरे की चीज बना डालती है और मध्यवर्ग के बच्चे, जो न तो अमीर हैं न गरीब, यहाँ टीवी से यूँ बाँध दिये गये हैं कि बड़ी छोटी उमर से ही वो इस कैदी जीवन के गुलाम हो जाते हैं। वे बच्चे जो बच्चे रह पाते हैं, फिर किस्मत के धनी और एक अजूबा ही माने जायेंगे।
        
           -एदुआर्दो  गालेआनो







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अस्मिता - मार्क ट्वेन

अस्मिता - 


मेरे पुरखे कहाँ हैं?  मैं किनका उत्सव मनाऊँ? अपनी अस्मिता का कच्चा माल कहाँ ढूँढू? मेरा सबसे पहला अमरीकी पूर्वज... एक मूलवासी था। समय की शुरुआत का एक मूलवासी। आपके पूर्वजों ने जीते-जी उसका ‘विकास’ कर डाला और अब मैं उसका एक अनाथ अंश हूँ।

(मार्क ट्वेन के शब्द जो एक गोरे थे। न्यूयार्क
टाइम्स में 26 दिसम्बर, 1891 को प्रकाशित।)







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न्याय - एदुआर्दो गालेआनो

न्याय -

1997 में ब्राजील के सान पाब्लो शहर की एक सड़क पर सरकारी प्लेट लगी एक मोटरकार बिलकुल सामान्य गति से चली आ रही थी। उस नयी और महँगी कार में तीन लोग सफर कर रहे थे। चैराहे पर एक पुलिसवाले ने उन्हें रोक दिया। उसने उन्हें कार से नीचे उतारकर करीब एक घण्टे तक उल्टे मुँह, दोनों हाथ ऊपर किये खड़ा रखा। इस दौरान वह उनसे बार-बार यह पूछ रहा था कि वह कार उन्होंने कहाँ से चुरायी है। वे तीन लोग अश्वेत थे। उनमें से एक, एदिवाल्दो ब्रितो, सान पाब्लो सरकार के न्यायिक सचिव थे। बाकी दो सचिवालय के कर्मचारी थे। ब्रितो के लिए यह कोई नयी बात नहीं थी। एक साल से भी कम समय में उनके साथ यह पाँच बार हो चुका था। जिस पुलिसवाले ने उन्हें रोका था वह भी अश्वेत था

                                 -एदुआर्दो  गालेआनो






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नजरिया-एदुआर्दो गालेआनो

नजरिया -

अगर ईसा मसीह के जन्म का स्तुतिगान करनेवाले सन्त न होते बल्कि सन्तनियाँ होतीं तो क्या होता? वे बतातीं कि ईसा के जन्म के समय मौजूद सन्त खोसे दरअसल उदास थे। उस पूरे खुशी के उत्सव में जहाँ नवजात ईसा अपने दिव्य आभा के साथ थे, सिर्फ सन्त खोसे ही उदास थे। वर्जिन मेरी, फरिश्ते, चरवाहे, भेड़ें, पूरब से आये सन्त सभी तो खुश थे सिर्फ सन्त खोसे के अलावा। पूछे जाने पर वह बोले ‘‘मुझे पुत्री चाहिए थी।’’ 

                                                -एदुआर्दो  गालेआनो






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व्यवस्था - एदुआर्दो गालेआनो

व्यवस्था 

"...कि वह कम्प्यूटर प्रोग्राम जो बैंकर को सतर्क करता है, बैंकर जो राजदूत को सचेत करता है, राजदूत जो फौजी जनरल के साथ खाना खाता है, फौजी जनरल जो राष्ट्रपति को मिलने के लिए बुलाता है, राष्ट्रपति जो मंत्री पर रोब दिखाता है, मंत्री जो महानिदेशक को धमकी देता है, महानिदेशक जो प्रबन्धक को जलील करता है, प्रबन्धक जो अफसर पर चीखता है, अफसर जो कर्मचारियों की तौहीन करते हैं, कर्मचारी जो मजदूरों को फटकारते हैं, मजदूर जो अपनी बीवी से बदसलूकी करते हैं, बीवियाँ जो बच्चे को पीटती हैं, बच्चे जो कुत्तों को लात मारते हैं। "

                                                            -एदुआर्दो  गालेआनो





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लू शुन

लू शुन


"व्यंग्यकार होना खतरनाक है,
... उसके व्यंग्य का उद्देश्य समाज है, और जब तक समाज नहीं बदलता, तब तक उसका व्यंग्य कायम रहेगा... और जबतक उसका व्यंग्य कायम रहेगा, आपका प्रहार बेकार जाएगा।
इसलिए किसी बेअदब व्यंग्यकार को परास्त करना है, तो समाज को बदल डालिये।"

               -लू शुन






"मैंने शब्दाडंबरों से बचने का भरपूर प्रयास किया। अगर मुझे लगा कि मैंने अपना भाव अच्छी तरह स्पष्ट कर दिया तो सीधे-सपाट ढंग से भी अपनी बात कह कर मुझे खुशी होती थी। पुराने चीनी रंगमंच पर कोइे दृश्यावली  नहीं होती थी और नये साल पर बच्चों को बेची जानेवाली तस्वीरों में  चित्रकारी बहुत कम ही होती है। इन चीजों ने मुझे इस बात का कायल बनाया कि मेरे उद्देश्य  के लिए ऐसे तरीके ही उचित हैं। मैं कभी गैर जरूरी बिस्तार में  नहीं उलझा और संवाद का प्रयोग भी कम से कम किया।"
   
               -लू शुन






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प्रगतिशील लेखक संघ (PROGRESSIVE WRITERS' MOVEMENT)

प्रगतिशील लेखक संघ 

अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक बीसवीं शताब्दी  के प्रारंभ में भारतीय प्रगतिशील लेखकों का एक समूह था। यह लेखक समूह अपने लेखन से सामाजिक समानता का समर्थन करता था और कुरीतियों, अन्याय व पिछड़ेपन का विरोध करता था। इसकी स्थापना 1935  में लंदन में हुई। इसके प्रणेता सज्जाद ज़हीर थे।

1935  के अंत तक लंदन से अपनी शिक्षा समाप्त करके सज्जाद ज़हीर भारत लौटे। यहाँ आने से पूर्व वे अलीगढ़ में डॉ अशरफ, इलाहबाद में अहमद अली, मुम्बई में कन्हैया लाल मुंशी, बनारस में प्रेमचंद, कलकत्ता में प्रो. हीरन मुखर्जी और अमृतसर में रशीद जहाँ को घोषणापत्र की प्रतियाँ भेज चुके थे। वे भारतीय अतीत के साहित्य  से उसका मानव प्रेम, उसकी यथार्थ प्रियता और उसका सौन्दर्य तत्व लेने के पक्ष में थे लेकिन वे प्राचीन दौर के अंधविश्वासों और धार्मिक साम्प्रदायिकता के ज़हरीले प्रभाव को समाप्त करना चाहते थे। 

सौभाग्य से जनवरी 1936  में 12-14  को हिन्दुस्तानी एकेडमी का वार्षिक अधिवेशन हुआ।  अनेक साहित्यकार यहाँ इक्कठे हुए - सच्चिदानंद सिन्हा, डॉ. अब्दुल हक़, गंगा नाथ झा, जोश मलीहाबादी, प्रेमचंद, रशीद जहाँ, अब्दुस्सत्तार सिद्दीकी इत्यादि। सज्जाद ज़हीर ने प्रेमचंद के साथ प्रगतिशील संगठन के घोषणापत्र पर खुलकर बात-चीत की। सभी ने घोषणापत्र पर हस्ताक्षर कर दिए। अहमद अली के घर को लेखक संगठन का कार्यालय बना दिया गया।  पत्र-व्यव्हार की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई। 

देखते-देखते सम्पूर्ण देश में प्रगतिशील लेखक संगठन की शाखाएँ फैलने लगीं। 1-10  अप्रैल 1936  को लखनऊ अधिवेशन में उस समय के प्रसिद्ध लेखक प्रेमचंद और जैनेन्द्र इसमें शामिल हुए। इस अधिवेशन में प्रेमचंद का अध्यक्षीय भाषण जब हिन्दी में रूपांतरित हुआ तो हिन्दी लेखकों की प्रेरणा का स्रोत बन गया । 

प्रगतिशील लेखक संघ का उद्देश्य साहित्य को स्वाधीनता आन्दोलन की सशक्त अभ्व्यक्ति बनाना और अत्याचारी शक्तियों का विरोध करना रहा। इसके सदस्य इस बात से सहमत थे की साहित्य व कला को मजदूरों, किसानों और सम्पूर्ण पीड़ित जनता का पक्षधर होना चाहिए और जन-सामान्य को एकजुट और संगठित करने और संघर्ष को सफल बनाने में सहायक होना चाहिए। 

1954  तक पहुँचते-पहुँचते यह आंदोलन आपसी सामंजस्य की कमी और उद्देश्यहीनता के चलते पतन की तरफ चल दिया। 

इस आंदोलन ने समाज में व्याप्त अंधविश्वास, धर्मान्धता पर प्रहार करा। कई प्रगतिशील और जनपक्षधर  कलाकारों , लेखकों, साहित्यकारों को जन्मा और संघर्ष की लड़ाई में जनता के नायकों को तैयार किया। 

नयी नस्लों को जरूरत है की वो इस धरोहर को अपनाये और उसके आगे और परिपक़्व बनायें।       


कुछ सदस्यों के नाम -


कैफ़ी आज़मी 
फैज़ अहमद फैज़ 

अहमद फ़राज़ 

हबीब जालिब 

साहिर लुधियानवी 

मज़ाज़ लखनवी 

अली सरदार जाफरी 

फ़िराक़ गोरखपुरी 

सददात हस्सन मंटो 

रशीद जाहाँ 

मुंशी प्रेमचंद 

जोश मलीहाबादी 

मखदूम मोहिउद्दीन 

अमृता प्रीतम 

भीषम साहनी 

अहमद नदीम क़ासमी 






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फिल्मकार - मृणाल सेन

फिल्मकार - मृणाल सेन  ( 14 मई 1923 - 30 दिसम्बर 2018 )


मृणाल सेन जैसे ही कुछ फिल्मकार थे जिन्होंने भारत में ऐसी फिल्मों का दौर शुरू किया जिनमें कहानियाँ असल ज़िन्दगी से जुड़ी होती थीं, उनमें कोई फ़िल्मी बाध्यता वाली मिलावट नहीं होती थी। लेकिन वे बांधकर रखने वाली और बेहद जरूरी, वे विश्व स्तर के फिल्म आर्ट की बराबरी करने वाली होती थीं। । उन्होंने अपने वक्त की अमानवीय स्थितियों को दर्शकों के सामने रखा। उनकी फिल्मों में गरीब, अकाल, अन्याय, सूखा, गैर-बराबरी जैसे विषयों को देखा गया।ऐसी फिल्मों को 'समानन्तर सिनेमा' या 'नया सिनेमा' कहा गया।   इसे लेकर मृणाल सेन ने कहा था--

    "मैं अपने ख़ुद के वक्त को समझने की कोशिश करता हूँ
      और उसे सामने रखने की कोशिश करता हूँ।"

मृणाल दा फरीदपुर में 14 मई 1923 को जन्मे थे। ये जगह अब बांग्लादेश में है। मृणाल फ़िल्मों के प्रसिद्ध निर्माता व निर्देशक थे। इनकी अधिकतर फ़िल्में बांग्ला भाषा में रही हैं। कलकत्ता के जाने-माने स्काॅटिश चर्च काॅलेज से फिजिक्स पढ़े, फिर कलकत्ता विश्वविद्यालय से आगे की पढ़ाई करी।

भारत और दुनिया के शीर्ष फिल्म स्कूलों में मृणाल दा की फिल्में पढ़ाई जाती हैं। फिल्म स्टूडेंट्स के अलावा विश्व सिनेमा में रुचि रखने वाले लोगों के लिए भी 'भुवम शोम, मृगया, अकालेर संधाने, खंडहर, खारिज, अकाश कुसुम, कोरस, जेनेसिस, एक दिन अचानक' जैसी फिल्में विशेष स्थान रखती हैं। 

भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) से परिचय होने के कारण भी उनको बहुत कुछ सीखने को मिला।

उनकी ‘नील आकाशेर नीचे’ (1958) आजाद भारत की पहली फिल्म थी। ये फिल्म महादेवी वर्मा की कहानी चीनी भाई पर आधारित थी। 'बैशे श्रावणा' (विवाह का दिन) की मशहूर फिल्म है जिसमें  विश्व युद्ध-2 से पहले की कहानी है। भुवन शोम (1969) उनकी सबसे उत्कृष्ट फिल्मों में से एक है। ‘लगान’ में भुवन (आमिर) की माँ का रोल करने वाली सुहासिनी मुले इस फिल्म में उत्पल दत्त के साथ प्रमुख भूमिका में थीं। ‘भुवन शोम’ कोई आम साँचे वाली कहानी नहीं थी। यह एक गहरे निहितार्थों वाला व्यंग्य और अनूठा मनोरंजन थी। भुवन शोम, फिल्म में उत्पल दत्त प्रमुख पात्रा की भूमिका में जो 50 साल का अधेड़ है। रेलवे में बड़ा अफसर है। एकाकी है। संवेदनाएँ नहीं है। जीवन जीता नहीं है। वह गुजरात के एक गाँव शिकार करने की छुट्टियाँ लेकर पहुँचता है। लेकिन उसने जीवन में जितनी विद्वता पायी थी वो यहाँ शून्य हो जाती है। यहाँ उसे गौरी नाम की गाँव की लड़की मिलती है जो न उसकी तरह पढ़ी लिखी है, न उसके पास बन्दूक है लेकिन व्यावहारिक तौर पर सब चीज उससे ज्यादा जानती है। ग्रामीण परिवेश के कपड़े पहनाती है ताकि पक्षी अनजान आदमी मानकर उड़ न जाएँ। ऐसी कई छोटी-छोटी चीजें वह करती है।उसकी खुश रहने की फिलाॅसफी भी है। इस लहर जैसी यात्रा के बाद भुवन शोम को जीवन में नयी दिशा मिलती। 

मिथुन चक्रवर्ती ने 1976 में जिस प्रशंसित फिल्म मृगया से अपनी यात्रा शुरू की थी और जिसके लिए उन्होंने बेस्ट एक्टर का नेशनल अवाॅर्ड जीता था उसे मृणाल दा ने ही बनायी थी। 2002 में 80 की उम्र में भी उन्होंने आमार भुवन नाम की एक फिल्म बनायी, वह भी फिल्ममेकिंग के प्रयोगों के साथ। 






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