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व्यंग्य क्या है ?


व्यंग्य क्या है -
 
व्यंग्य साहित्य की एक विधा है जिसमें जीवन व समाज की विसंगतियों, खोखलेपन और पाखंड की आलोचना सीधे-सीधे न कर रचनात्मक तरीके से की जाती है और साथ ही साथ पाठक पर प्रहार करके उसे सोचने के लिए मजबूर करती है। 

व्यंग्य को रोचक बनाने के लिए व्यंग्यकार उसमें हास्य डालता है लेकिन यह ध्यान रखता है की उसकी रचना केवल हास्य के लिए न हो बल्कि उसमें आक्रामकता रहे और वह विसंगतियों की पूर्ण रूप  से आलोचना करें। जो व्यंग्य  निरुदेश्य हास्य के लिए बनाया गया हो , वह बेकार है।  

व्यंग्य में मारक क्षमता बहुत अधिक होती है। इसका इस्तेमाल कविता,उपन्यास, नाटक, चित्र, हर कला और हर जगह में किया जा सकता है।  

व्यंग्यकार का तर्कशील व वैज्ञानिक होना बेहद जरूरी है। हर एक नीति  या घटना का सही मूल्यांकन नहीं करने से वह विसंगतियों को ठीक करने की बजाय बिलकुल उल्टा कार्य करेगा।       


व्यंग्य का इतिहास -

मध्यकाल की सामाजिक विसंगतियों पर कबीर ने व्यंग्यपूर्ण शैली में प्रहार किया है। जाति-भेद,  हिंदू-मुस्लमानों के धर्माडंबर, गरीबी-अमीरी, रूढ़िवादिता आदि पर कबीर के व्यंग्य बड़े मारक हैं। उदहारण के लिए -

"कांकर पाथर जोरि कै मस्जिद लई चुनाय। ता चढ़ि मुल्ला बांगि दे क्या बहरा हुआ खुदाय"

कबीर ने किसी एक समुदाय पर ही व्यंग्य नहीं रचे, हिन्दुओं की मूर्तिपूजा एवं उनके अन्धविश्वासों पर व्यंग्य करते हुए उन्होनें लिखा - 

"पाथर पूजै हरि मिलै तो मैं पुजूँ पहाड़"     
   
युगीन समस्याओं पर व्यंग्य करने की प्रवृत्ति प्रेमचंद में भी बहुत मिलती है। इन्होंने अपनी कहानियों और उपन्यासों में आम आदमी और कृषक वर्ग की दैनंदिन कठिनाइयों पर करारा व्यंग्य किया है। प्रेमचंद के बाद के रचनाकारों में निराला साहित्य में इसे देखा जा सकता है।

निराला की तरह नागार्जुन ने भी व्यंग्य को शैली के रूप में इस्तेमाल किया है। मुक्तिबोध, धूमिल, दुष्यंत कुमार आदि के यहाँ आते-आते व्यंग्य अन्याय के खिलाफ संघर्ष करने का कारगर हथियार बन जाता है। धूमिल की "संसद से सड़क तक" की कविताएँ, मुक्तिबोध की 'काव्यकृति चाँद का मुँह टेढ़ा है' की कविता "अँधेरे में" एवं दुष्यंत कुमार की गज़लों में व्यंग्य एक विधा बनने के साथ-साथ विरोध जताने का एक असरदार माध्यम भी बन जाता है।

गुलाम भारत में होने वाला शोषण - अत्याचार आजादी के बाद कम होने के बजाय और अधिक बढ़ गया। व्यक्ति निजी स्वार्थ तक सीमित होकर रह गया है। ये विसंगतियाँ और जटिलताएँ व्यंग्य के लिए आधारभूमि बनीं।  स्वातंत्रयोत्तर हिन्दी साहित्य में व्यंग्य का पर्याप्त सृजन हुआ है। हिन्दी में हरिशंकर परसाई इस विधा के प्रमुख हस्ताक्षर हैं।


व्यंग्य का भविष्य -

वास्तव में जब तक समाज देश और राजनीति में भ्रष्टाचार, विसंगतियॉं, मूल्यहीनता एवं विद्रूपताएँ विद्यमान रहेंगी इन पर चोट एवं इनका विरोध व्यंग्य द्वारा ही कारगर रूप से हो सकेगा। क्योंकि व्यंग्य जो गलत है उस पर तल्ख चोट तो करता ही है साथ में जो सही होना चाहिए उस की ओर इशारा भी करता है।  





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छापते नहीं, छुपाते हैं - व्यंग्य

व्यंग्य 

छापते नहीं, छुपाते हैं -


एक बार नारद मुनि परानुग्रह  की आकांक्षा  से मत्र्यलोक के भ्रमण  पर निकले। सुबह-सुबह जिसे देखा, हाथ में  बड़े-बड़े कागज  लिये अपना चेहरा उसमें छिपाये हुए है। पूछा- ‘यह कौन सा पुराण है, वत्स?’

‘महाराज यह अखबार है। कलयुग है, यहाँ पुराण-कुराण नहीं, अखबार ही सबसे पवित्र है।’

‘इसमें किस प्रकार के वचन और सूक्त होते हैं?’

‘आप ही जैसा काम अखबार वाले भी करते हैं, यहाँ की बात वहाँ। अंतर  बस  इतना  है  कि  इनके स्वामीगण समझदार हैं, मितभाषी हैं, आपकी तरह वाचाल नहीं। ये जितना छापते नहीं,  उससे  ज्यादा छुपाते हैं।’

‘स्वामीगण अपने  भोजन-वस्त्रादि के  लिये धन कहाँ से प्राप्त करते हैं? क्या इनकी बिक्री से धनार्जन करते हैं?’

‘नहीं महाराज, अखबार तो शौकिया निकालते हैं, धनार्जन चीटफंडम, रियलइस्टेटम, शेयरबाजारम अथवा अन्य व्यवसायों से करते हैं।’

नारद जी का मष्तिष्क चक्कर खाने लगा। वे नारायण-नारायण कहते  इस  स्वानुभूत सत्य की मीमांसा करने और स्वर्गलोक में  यह नया सन्देश पहुँचाने चल पड़े़े।







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भारत को चाहिए जादूगर और साधू - हरिशंकर परसाई

व्यंग्य 

भारत को चाहिए जादूगर और साधू - हरिशंकर परसाई 


हर 15 अगस्त और 26 जनवरी को मैं सोचता हूँ कि साल-भर में कितने बढ़े। न सोचूँ तो भी काम चलेगा - बल्कि ज्यादा आराम से चलेगा। सोचना एक रोग है, जो इस रोग से मुक्त हैं और स्वस्थ हैं, वे धन्य हैं।

यह 26 जनवरी 1972 फिर आ गया। यह गणतंत्रा दिवस है, मगर ‘गण’ टूट रहे हैं। हर गणतंत्रा दिवस ‘गण’ के टूटने या नए ‘गण’ बनने के आंदोलन के साथ आता है। इस बार आंध्र और तेलंगाना हैं। अगले साल इसी पावन दिवस पर कोई और ‘गण’ संकट आएगा।

इस पूरे साल में मैंने दो चीजें देखीं। दो तरह के लोग बढ़े - जादूगर और साधु बढ़े। मेरा अंदाज था, सामान्य आदमी के जीवन के सुभीते बढ़ेंगे- मगर नहीं। बढ़े तो जादूगर और साधु-योगी। कभी-कभी सोचता हूँ कि क्या ये जादूगर और साधु ‘गरीबी हटाओ’ प्रोग्राम के अंतर्गत ही आ रहे हैं! क्या इसमें कोई योजना है?

रोज अखबार उठाकर देखता हूँ। दो खबरें सामने आती हैं - कोई नया जादूगर और कोई नया साधु पैदा हो गया है। उसका विज्ञापन छपता है। जादूगर आँखों पर पट्टी बाँधकर स्कूटर चलाता है और ‘गरीबी हटाओ’ वाली जनता कामधाम छोड़कर, तीन-चार घंटे आँखों पर पट्टी बाँधे जादू्गर को देखती हजारों की संख्या में सड़क के दोनों तरफ खड़ी रहती है। ये छोटे जादूगर हैं। इस देश में बड़े-बड़े जादूगर हैं, जो छब्बीस सालों से आँखों पर पट्टी बाँधे हैं। जब वे देखते हैं कि जनता अकुला रही है और कुछ करने पर उतारू है, तो वे फौरन जादू का खेल दिखाने लगते हैं। जनता देखती है, ताली पीटती है। मैं पूछता हूँ - जादूगर साहब, आँखों पर पट्टी बाँधे राजनीतिक स्कूटर पर किधर जा रहे हो? किस दिशा को जा रहे हो - समाजवाद? खुशहाली? गरीबी हटाओ? कौन सा गंतव्य है? वे कहते हैं - गंतव्य से क्या मतलब? जनता आँखों पर पट्टी बाँधे जादूगर का खेल देखना चाहती है। 

हम दिखा रहे हैं। जनता को और क्या चाहिए? जनता को सचमुच कुछ नहीं चाहिए। उसे जादू के खेल चाहिए। मुझे लगता है, ये दो छोटे-छोटे जादूगर रोज खेल दिखा रहे हैं, इन्होंने प्रेरणा इस देश के राजनेताओं से ग्रहण की होगी। जो छब्बीस सालों से जनता को जादू के खेल दिखाकर खुश रखे हैं, उन्हें तीन-चार घंटे खुश रखना क्या कठिन है। इसलिए अखबार में रोज फोटो देखता हूँ, किसी शहर में नए विकसित किसी जादूगर की।

सोचता हूँ, जिस देश में एकदम से इतने जादूगर पैदा हो जाएँ, उस जनता की अंदरूनी हालत क्या है? वह क्यों जादू से इतनी प्रभावित है? वह क्यों चमत्कार पर इतनी मुग्ध
है? वह जो राशन की दुकान पर लाइन लगाती है और राशन नहीं मिलता, वह लाइन छोड़कर जादू के खेल देखने क्यों खड़ी रहती है?

मुझे लगता है, छब्बीस सालों में देश की जनता की मानसिकता ऐसी बना दी गयी है कि जादू देखो और ताली पीटो। चमत्कार देखो और खुश रहो।

 बाकी काम हम पर छोड़ो।

भारत-पाक युद्ध ऐसा ही एक जादू था। जरा बड़े स्केल का जादू था, पर था जादू ही। जनता अभी तक ताली पीट रही है।

उधर राशन की दुकान पर लाइन बढ़ती जा रही है।

देशभक्त मुझे माफ करें। पर मेरा अंदाज है, जल्दी ही एक शिमला शिखर-वार्ता और होगी। भुट्टो कहेंगे - पाकिस्तान में मेरी हालत खस्ता। अलग-अलग राज्य बनना चाह रहे हैं। गरीबी बढ़ रही है। लोग भूखे मर रहे हैं।

हमारी प्रधानमंत्री कहेंगी - इधर भी गरीबी हट नहीं रही। कीमतें बढ़ती जा रही हैं। जनता में बड़ी बेचैनी है। बेकारी बढ़ती जा रही है।

तब दोनों तय करेंगे - क्यों न पंद्रह दिनों का एक और जादू हो जाए। चार-पाँच साल दोनों देशों की जनता इस जादू के असर में रहेगी। (देशभक्त माफ करें - मगर जरा सोंचें)

जब मैं इन शहरों के इन छोटे जादूगरों के करतब देखता हूँ तो कहता हूँ - बच्चों, तुमने बड़े जादू नहीं देखे। छोटे देखे हैं तो छोटे जादू ही सीखे हो।

दूसरा कमाल इस देश में साधु है। अगर जादू से नहीं मानते और राशन की दुकान पर लाइन लगातार बढ़ रही है, तो लो, साधु लो।

जैसे जादूगरों की बाढ़ आई है, वैसे ही साधुओं की बाढ़ आई है। इन दोनों में कोई सम्बन्ध जरूर है।

साधु कहता है - शरीर मिथ्या है। आत्मा को जगाओ। उसे विश्वात्मा से मिलाओ। अपने को भूलो। अपने सच्चे स्वरूप को पहचानो। तुम सत-चित-आनंद हो।

आनंद ही ब्रह्म है। राशन ब्रह्म नहीं। जिसने ‘अन्नं ब्रह्म’ कहा था, वह झूठा था। नौसिखिया था। अंत में वह इस निर्णय पर पहुँचा कि अन्न नहीं ‘आनंद’ ही ब्रह्म है।

पर भरे पेट और खाली पेट का आनंद क्या एक सा है? नहीं है तो ब्रह्म एक नहीं अनेक हुए। यह शास्त्रोक्त भी है - ‘एको ब्रह्म बहुस्याम।’ ब्रह्म एक है पर वह कई हो जाता है।
एक ब्रह्म ठाठ से रहता है, दूसरा राशन की दुकान में लाइन से खड़ा रहता है, तीसरा रेलवे के पुल के नीचे सोता है।

सब ब्रह्म ही ब्रह्म है।

शक्कर में पानी डालकर जो उसे वजनदार बनाकर बेचता है, वह भी ब्रह्म है और जो उसे मजबूरी में खरीदता है, वह भी ब्रह्म है।

ब्रह्म, ब्रह्म को धोखा दे रहा है।

साधु का यही कर्म है कि मनुष्य को ब्रह्म की तरफ ले जाय और पैसे इकट्ठे करे; क्योंकि ‘ब्रह्म सत्यं जगतमिथ्या।’

26 जनवरी आते आते मैं यही सोच रहा हूँ कि ‘हटाओ गरीबी’ के नारे को, हटाओ महँगाई को, हटाओ बेकारी को, हटाओ भुखमरी को, क्या हुआ?

बस, दो तरह के लोग बहुतायत से पैदा करें - जादूगर और साधु।

ये इस देश की जनता को कई शताब्दी तक प्रसन्न रखेंगे और ईश्वर के पास पहुँचा देंगे।

भारत-भाग्य विधाता। हममें वह क्षमता दे कि हम तरह-तरह के जादूगर और साधु इस देश में लगातार बढ़ाते जाएँ।

हमें इससे क्या मतलब कि ‘तर्क की धारा सूखे मरूस्थल की रेत में न छिपे’(रवींद्रनाथ) वह तो छिप गई। इसलिए जन-गण-मन अधिनायक! बस हमें जादूगर और पेशेवर साधु चाहिए। तभी तुम्हारा यह सपना सच होगा कि हे परमपिता, उस स्वर्ग में मेरा यह देश जाग्रत हो। (जिसमें जादू्गर और साधु जनता को खुश रखें)।

यह हो रहा है, परमपिता की कृपा से!






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भोलाराम का जीव - हरिशंकर परसाई

व्यंग्य 

भोलाराम का जीव - हरिशंकर परसाई 


धर्मराज लाखों वर्षों से असंख्य आदमियों को कर्म और सिफारिश के आधार पर स्वर्ग या नरक में निवास-स्थान ‘अलाॅट’ करते आ रहे थे। पर ऐसा कभी नहीं हुआ था। सामने बैठे चित्रागुप्त बार-बार चश्मा पोंछ, बार-बार थूक से पन्ने पलट, रजिस्टर पर रजिस्टर देख रहे थे। गलती पकड़ में ही नहीं आ रही थी। आखिर उन्होंने खीझकर रजिस्टर इतने जोर से बन्द किया कि मक्खी चपेट में आ गयी। उसे निकालते हुए वे बोले-- ‘महाराज, रिकाॅर्ड सब ठीक है। भोलाराम के जीव ने पाँच दिन पहले देह त्यागी और यमदूत के साथ इस लोक के लिए रवाना भी हुआ, पर यहाँ अभी तक नहीं पहुँचा।’

धर्मराज ने पूछा-- ‘और वह दूत कहाँ है?’  

‘महाराज, वह भी लापता है।’

इसी समय द्वार खुले और एक यमदूत बदहवास वहाँ आया। उसका मौलिक कुरूप चेहरा परिश्रम, परेशानी और भय के कारण और भी विकृत हो गया था। उसे देखते ही चित्रागुप्त चिल्ला उठे-- ‘अरे, तू  कहाँ रहा इतने दिन? भोलाराम का जीव कहाँ है?’

यमदूत हाथ जोड़कर बोला‘- ‘दयानिधान, मैं कैसे बतलाऊँ कि क्या हो गया। आज तक मैंने धोखा नहीं खाया था, पर भोलाराम का जीव मुझे चकमा दे गया। पाँच दिन पहले जब जीव ने भोलाराम की देह त्यागी, तब मैंने उसे पकड़ा और इस लोक की यात्रा आरम्भ की नगर के बाहर ज्यों ही मैं उसे लेकर एक तीव्र वायु-तरंग पर सवार हुआ त्यों ही वह मेरे चंगुल से छूटकर न जाने कहाँ गायब हो गया। इन पाँच दिनों में मैंने सारा ब्रह्माण्ड छान डाला, पर उसका कहीं पता नहीं चला।’

धर्मराज क्रोध से बोला-- ‘मूर्ख! जीवों को लाते-लाते बूढ़ा हो गया फिर भी एक मामूली बूढ़े आदमी के जीव ने तुझे चकमा दे दिया।’

दूत ने सिर झुकाकर कहा-- ‘महाराज, मेरी सावधानी में बिलकुल कसर नहीं थी। मेरे इन अभ्यस्त हाथों से अच्छे-अच्छे वकील भी नहीं छूट सके। पर इस बार तो कोई इन्द्रजाल ही हो गया।’

चित्रागुप्त ने कहा- ‘महाराज, आजकल पृथ्वी पर इस प्रकार का व्यापार बहुत चला है। लोग दोस्तों को कुछ चीज भेजते हैं और उसे रास्ते में ही रेलवे वाले उड़ा लेते हैं। होजरी के पार्सलों के मोजे रेलवे अफसर पहनते हैं। मालगाड़ी के डब्बे के डब्बे रास्ते में कट जाते हैं। एक बात और हो रही है। राजनीतिक दलों के नेता विरोधी नेता को उड़ाकर बन्द कर देते हैं। कहीं भोलाराम के जीव को भी तो किसी विरोधी ने मरने के बाद खराबी करने के लिए तो नहीं उड़ा दिया?’

धर्मराज ने व्यंग्य से चित्रागुप्त की ओर देखते हुए कहा-- ‘तुम्हारी भी रिटायर होने की उमर आ गयी। भला भोलाराम जैसे नगण्य, दीन आदमी से किसी को क्या लेना-देना?’

इसी समय कहीं से घूमते-घामते नारद मुनि यहाँ आ गये। धर्मराज को गुमसुम बैठे देख बोले-- ‘क्यों धर्मराज, कैसे चिन्तित बैठे हैं? क्या नरक में निवास-स्थान की समस्या अभी हल नहीं हुई?’

धर्मराज ने कहा-- ‘वह समस्या तो कब की हल हो गयी। नरक में पिछले सालों में बड़े गुणी कारीगर आ गये हैं। कई इमारतों के ठेकेदार हैं जिन्होंने पूरे पैसे लेकर रद्दी इमारतें बनायीं। बड़े-बड़े इंजीनियर भी आ गये हैं जिन्होंने ठेकेदारों से मिलकर पंचवर्षीय योजनाओं का पैसा खाया। ओवरसीयर हैं, जिन्होंने उन मजदूरों की हाजिरी भरकर पैसा हड़पा जो कभी काम पर गये ही नहीं। इन्होंने बहुत जल्दी नरक में कई इमारतें तान दी हैं। वह समस्या तो हल हो गयी, पर एक बड़ी विकट उलझन आ गयी है। भोलाराम नाम के एक आदमी की पाँच दिन पहले मृत्यु हुई। उसके जीव को यह दूत यहाँ ला रहा था, कि जीव इसे रास्ते में चकमा देकर भाग गया। इसने सारा ब्रह्माण्ड छान डाला, पर वह कहीं नहीं मिला। अगर ऐसा होने लगा, तो पाप-पुण्य का भेद ही मिट जायेगा।’

नारद ने पूछा- ‘उस पर इनकमटैक्स तो बकाया नहीं था? हो सकता है, उन लोगों ने रोक लिया हो।’

चित्रागुप्त ने कहा-- ‘इनकम होती तो टैक्स होता। भुखमरा था।’

नारद बोले-- ‘मामला बड़ा दिलचस्प है। अच्छा मुझे उसका नाम पता तो बताओ। मैं पृथ्वी पर जाता हूँ।’

चित्रागुप्त ने रजिस्टर देखकर बताया-- ‘भोलाराम नाम था उसका। जबलपुर शहर में धमापुर मुहल्ले में नाले के किनारे एक डेढ़ कमरे के टूटे-फूटे मकान में वह परिवार समेत रहता था। उसकी एक स्त्री थी, दो लड़के और एक लड़की। उम्र लगभग साठ साल। सरकारी नौकर था। पाँच साल पहले रिटायर हो गया था। मकान का किराया उसने एक साल से नहीं दिया, इसलिए मकान मालिक उसे निकालना चाहता था। इतने में भोलाराम ने संसार ही छोड़ दिया। आज पाँचवाँ दिन है। बहुत सम्भव है कि अगर मकान-मालिक वास्तविक मकान-मालिक है तो उसने भोलाराम के मरते ही उसके परिवार को निकाल दिया होगा। इसलिए आपको परिवार की तलाश में काफी घूमना पड़ेगा।’

माँ-बेटी के सम्मिलित क्रंदन से ही नारद भोलाराम का मकान पहचान गये।

द्वार पर जाकर उन्होंने आवाज लगायी-- ‘नारायण! नारायण!’ लड़की ने देखकर कहा-- ‘आगे जाओ महाराज।’

नारद ने कहा-- ‘मुझे भिक्षा नहीं चाहिए, मुझे भोलाराम के बारे में कुछ पूछताछ करनी है। अपनी माँ को जरा बाहर भेजो, बेटी!’

भोलाराम की पत्नी बाहर आयी। नारद ने कहा-- ‘माता, भोलाराम को क्या बीमारी थी?’

‘क्या बताऊँ? गरीबी की बीमारी थी। पाँच साल हो गये, पेंशन पर बैठे। पर पेंशन अभी तक नहीं मिली। हर दस-पन्द्रह दिन में एक दरख्वास्त देते थे, पर वहाँ से या तो जवाब आता ही नहीं था और आता तो यही कि तुम्हारी पेंशन के मामले में विचार हो रहा है। इन पाँच सालों में सब गहने बेचकर हम लोग खा गये। फिर बरतन बिके। अब कुछ नहीं बचा था। चिन्ता में घुलते-घुलते और भूखे मरते-मरते उन्होंने दम तोड़ दिया।’

नारद ने कहा-- ‘क्या करोगी माँ? उनकी इतनी ही उम्र थी।’ 

‘ऐसा तो मत कहो, महाराज! उम्र तो बहुत थी। पचास साठ रुपया महीना पेंशन मिलती तो कुछ और काम कहीं करके गुजारा हो जाता। पर क्या करें? पाँच साल नौकरी से बैठे हो गये और अभी तक एक कौड़ी नहीं मिली।’

दुःख की कथा सुनने की फुरसत नारद को थी नहीं। वे अपने मुद्दे पर आये, ‘माँ, यह तो बताओ कि यहाँ किसी से उनका विशेष प्रेम था, जिसमें उन का जी लगा हो?’

पत्नी बोली-- ‘लगाव तो महाराज, बाल बच्चों से ही होता है।’

‘नहीं, परिवार के बाहर भी हो सकता है। मेरा मतलब है, किसी स्त्राी...’

स्त्राी ने गुर्रा कर नारद की ओर देखा। बोली-- ‘अब कुछ मत बको महाराज! तुम साधु हो, उचक्के नहीं हो। जिन्दगी भर उन्होंने किसी दूसरी स्त्राी की ओर आँख उठाकर नहीं देखा।’

नारद हँसकर बोले-- ‘हाँ, तुम्हारा यह सोचना ठीक ही है। यही हर अच्छी गृहस्थी का आधार है। अच्छा, माता मैं चला।’

स्त्राी ने कहा-- ‘महाराज, आप तो साधु हैं, सिद्ध पुरूष हैं। कुछ ऐसा नहीं कर सकते कि उनकी रुकी हुई पेंशन मिल जाये। इन बच्चों का पेट कुछ दिन भर जाये।’

नारद को दया आ गयी थी। वे कहने लगे-- ‘साधुओं की बात कौन मानता है? मेरा यहाँ कोई मठ तो है नहीं। फिर भी मैं सरकारी दफ्तर जाऊँगा और कोशिश करूँगा।’

वहाँ से चलकर नारद सरकारी दफ्तर पहुँचे। वहाँ पहले ही से कमरे में बैठे बाबू से उन्होंने भोलाराम के केस के बारे में बातें कीं। उस बाबू ने उन्हें ध्यानपूर्वक देखा और बोला-- ‘भोलाराम ने दरख्वास्तें तो भेजी थीं, पर उन पर वजन नहीं रखा था, इसलिए कहीं उड़ गयी होंगी।’

नारद ने कहा-- ‘भई, ये बहुत से ‘पेपर-वेट’ तो रखे हैं। इन्हें क्यों नहीं रख दिया?’

बाबू हँसा-- ‘आप साधु हैं, आपको दुनियादारी समझ में नहीं आती। दरख्वास्तें ‘पेपरवेट’ से नहीं दबतीं। खैर, आप उस कमरे में बैठे बाबू से मिलिए।’

नारद उस बाबू के पास गये। उसने तीसरे के पास भेजा, तीसरे ने चैथे के पास चैथे ने पाँचवें के पास। जब नारद पच्चीस-तीस बाबुओं और अफसरों के पास घूम आये तब एक चपरासी ने कहा-- ‘महाराज, आप क्यों इस झंझट में पड़ गये। अगर आप साल भर भी यहाँ चक्कर लगाते रहे, तो भी काम नहीं होगा। आप तो सीधे बड़े साहब से मिलिए। उन्हें खुश कर दिया तो अभी काम हो जायेगा।’

नारद बड़े साहब के कमरे में पहुँचे। बाहर चपरासी ऊँघ रहा था। इसलिए उन्हें किसी ने छेड़ा नहीं। बिना ‘विजिटिंग कार्ड’ के आया देख साहब बड़े नाराज हुए। बोले-- ‘इसे कोई मन्दिर-वन्दिर समझ लिया है क्या? धड़धड़ाते चले आये! चिट क्यों नहीं भेजी?’

नारद ने कहा-- ‘कैसे भेजता? चपरासी सो रहा है।’

‘क्या काम है?’ साहब ने रौब से पूछा।

नारद ने भोलाराम का पेंशन केस बतलाया।

साहब बोले-- ‘आप हैं बैरागी। दफ्तरों के रीति-रिवाज नहीं जानते। असल में भोलाराम ने गलती की। भई, यह भी एक मन्दिर है। यहाँ भी दान-पुण्य करना पड़ता है। आप भोलाराम के आत्मीय मालूम होते हैं। भोलाराम की दरख्वास्तें उड़ रही हैं। उन पर वजन रखिए।’

नारद ने सोचा कि फिर यहाँ वजन की समस्या खड़ी हो गयी। साहब बोले-- ‘भई, सरकारी पैसे का मामला है। पेंशन का केस बीसों दफ्तरों में जाता है। देर लग ही जाती है। बीसों बार एक ही बात को बीस जगह लिखना पड़ता है, तब पक्की होती है। जितनी पेंशन मिलती है उतने की स्टेशनरी लग जाती है। हाँ, जल्दी भी हो सकती है मगर...’ साहब रुके।

नारद ने कहा-- ‘मगर क्या?’

साहब ने कुटिल मुसकान के साथ कहा, ‘मगर वजन चाहिए। आप समझे नहीं। जैसे आपकी यह सुन्दर वीणा है, इसका भी वजन भोलाराम की दरख्वास्त पर रखा जा सकता है। मेरी लड़की गाना बजाना सीखती है। यह मैं उसे दे दूँगा। साधु-संतों की वीणा से तो और अच्छे स्वर निकलते हैं।’

नारद अपनी वीणा छिनते देख जरा घबराये। पर फिर संभलकर उन्होंने वीणा को टेबल पर रखकर कहा-- ‘यह लीजिए। अब जरा जल्दी उसकी पेंशन आर्डर निकाल दीजिए।’

साहब ने प्रसन्नता से उन्हें कुर्सी दी, वीणा को एक कोने में रखा और घंटी बजायी। चपरासी हाजिर हुआ।

साहब ने हुक्म दिया - बड़े बाबू से भोलाराम के केस की फाइल लाओ।

थोड़ी देर बाद चपरासी भोलाराम की सौ-डेढ़-सौ दरख्वास्तों से भरी फाइल लेकर आया। उसमें पेंशन के कागजात भी थे। साहब ने फाइल पर नाम देखा और निश्चित करने के लिए पूछा-- ‘क्या नाम बताया साधु जी आपने?’

नारद समझे कि साहब कुछ ऊँचा सुनता है। इसलिए जोर से बोले-- ‘भोलाराम!’

सहसा फाइल में से आवाज आयी-- ‘कौन पुकार रहा है मुझे। पोस्टमैन है? क्या पेंशन का आर्डर आ गया?’

नारद चौंके। पर दूसरे ही क्षण बात समझ गये। बोले-- ‘भोलाराम! तुम क्या भोलाराम के जीव हो?’

‘हाँ! आवाज आयी।’

नारद ने कहा-- ‘मैं नारद हूँ। तुम्हें लेने आया हूँ। चलो स्वर्ग में तुम्हारा इंतजार हो रहा है।’

आवाज आयी-- ‘मुझे नहीं जाना। मैं तो पेंशन की दरख्वास्तों पर अटका हूँ। यहीं मेरा मन लगा है। मैं अपनी दरख्वास्तें छोड़कर नहीं जा सकता।’

 


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प्रेमचन्द के फटे जूते -हरिशंकर परसाई

व्यंग्य

             प्रेमचन्द के फटे जूते -हरिशंकर परसाई


प्रेमचन्द का एक चित्र मेरे सामने है, पत्नी के साथ फोटो खिंचा रहे हैं। सर पर किसी मोटे कपडे़ की टोपी, कुर्ता और धोती पहने हैं। कनपटी चिपकी है, गालों की हड्डियाँ उभर आयी हैं, पर घनी मूँछे चेहरे को भरा-भरा बतलाती हैं ।

पाँवों में कैनवस के जूते हैं, जिनके बन्द बेतरतीब बन्धे हैं। लापरवाही से उपयोग करने पर बन्द के सिरों पर लोहे की पतरी निकल जाती है और छेदों में बन्द डालने में परेशानी होती है। तब बन्द कैसे भी कस
लिये जाते हैं।

दाहिने पाँव का जूता ठीक है, मगर बाएँ जूते में बड़ा छेद हो गया है, जिसमें से अँगुली बाहर निकल आयी है।

मेरी दृष्टि इस जूते पर अटक गयी है। सोचता हूँ- फोटो खिंचाने की अगर ये पोशाक है, तो पहनने की कैसी होगी?नहीं, इस आदमी की अलग-अलग पोशाकें नहीं होंगी।इसमें पोशाकें बदलने का गुण नहीं है। यह जैसा है, वैसा ही फोटो में खिंच जाता है।

मैं चेहरे की तरफ देखता हूँ। क्या तुम्हें मालूम है, मेरे साहित्यिक पुरखे कि तुम्हारा जूता फट गया है और अँगुली बाहर दिख रही है? क्या तुम्हें इसका जरा भी एहसास नहीं है? जरा लज्जा, संकोच या झेंप नहीं है? क्या तुम इतना भी नहीं जानते कि धोती को थोड़ा नीचे खींच लेने से अँगुली ढक सकती है? मगर फिर भी तुम्हारे चेहरे पर बड़ी बेपरवाही, बड़ा विश्वास है! फोटोग्राफर ने जब ‘रेडी-प्लीज’ कहा होगा, तब परम्परा के अनुसार तुमने मुस्कान लाने की कोशिश की होगी, दर्द के गहरे कुएँ के तल में कहीं पड़ी मुस्कान को धीरे-धीरे खींचकर ऊपर निकाल रहे होंगे कि बीच में ही ‘क्लिक’ करके फोटोग्राफर ने ‘थैंक यू’ कह दिया होगा। विचित्रा है ये अधूरी मुस्कान। यह मुस्कान नहीं है,इसमें   उपहास है, व्यंग्य है!

यह कैसा आदमी है, जो खुद तो फटे जूते पहने फोटो खिंचवा रहा है, पर किसी पर हँस भी रहा है।

फोटो ही खिंचाना था, तो ठीक जूते पहन लेते या न खिंचाते। फोटो न खिंचाने से क्या बिगड़ता था! शायद पत्नी का आग्रह रहा हो और तुम ‘अच्छा चल भई’ कहकर बैठ गये होंगे। मगर यह कितनी बड़ी ‘ट्रेजडी’ है कि आदमी के पास फोटो खिंचाने को भी जूता न हो। मैं तुम्हारी यह फोटो देखते-देखते, तुम्हारे क्लेश को अपने भीतर महसूस करके जैसे रो पड़ना चाहता हूँ, मगर तुम्हारी आँखों का यह तीखा दर्द भरा व्यंग्य मुझे एकदम रोक देता है।

तुम फोटो का महत्त्व नहीं समझते। समझते होते, तो किसी से फोटो खिंचाने के लिए जूते माँग लेते। लोग तो माँगे के कोट से वर-दिखाई करते हैं और माँगे की मोटर से बरात निकालते हैं, तुमसे जूते ही माँगते नहीं बने! तुम फोटो का महत्त्व नहीं जानते। लोग तो इत्रा चुपड़कर फोटो खिंचाते है जिससे फोटो में खुशबू आ जाये। गंदे से गंदे आदमी की फोटो भी खुशबू देती है।

टोपी आठ आने में मिल जाती है और जूते उस जमाने में भी पाँच रुपये से कम में क्या मिलते होंगे! जूता हमेशा टोपी से कीमती रहा है। अब तो अच्छे जूते की कीमत और बढ़ गयी है और एक जूते पर पचीसों टोपियाँ न्योछावर होती हैं। तुम भी जूते और टोपी के अनुपातिक मूल्य के मारे हुए थे। यह विडम्बना मुझे इतनी तीव्रता से कभी नहीं चुभी, जितनी आज चुभ रही है जब मैं तुम्हारा फटा जूता देख रहा हूँ। तुम महान कथाकार, उपन्यास सम्राट, युग-प्रवर्तक, जाने क्या-क्या कहलाते थे, मगर फोटो में तुम्हारा जूता फटा हुआ है।

मेरा जूता भी कोई अच्छा नहीं है। यों ऊपर से अच्छा दिखता है। अंँगुली बाहर नहीं निकलती, पर अँगूठे के नीचे तला फट गया है। अँगूठा जमीन से घिसता है और पैनी गिट्टी पर कभी रगड़ खाकर लहूलुहान भी हो जाता है।

पूरा तला गिर जायेगा, पूरा पँजा छिल जायेगा, मगर अँगुली बाहर नहीं दिखेगी। तुम्हारी अँगुली दिखती है, पर पाँव सुरक्षित है। मेरी अँगुली ढकी है पर पंजा नीचे घिस रहा है। तुम परदे का महत्त्व नहीं जानते, हम परदे पर कुर्बान हो रहे हैं।

तुम फटा जूता बड़े ठाठ से पहने हो! मैं ऐसे नहीं पहन सकता। फोटो तो जिन्दगी भर इस तरह नहीं खिंचाऊँ, चाहे कोई जीवनी बिना फोटो के ही छाप दे।

तुम्हारी यह व्यंग्य-मुस्कान मेरे हौसले पस्त कर देती है। क्या मतलब है इसका? कौन सी मुस्कान है ये?

- क्या होरी का गोदान हो गया?

- क्या पूस की रात में सूअर हलकू का खेत चर गये?

- क्या सुजान भगत का लड़का मर गया; क्योंकि डाॅक्टर क्लब छोड़कर नहीं आ सकते?

नहीं मुझे लगता है माधो औरत के कफन के चन्दे की शराब पी गया।

वही मुस्कान मालूम होती है। 

मैं तुम्हारा जूता फिर देखता हूँ। कैसे फट गया यह, मेरी जनता के लेखक?

क्या बहुत चक्कर काटते रहे?

क्या बनिये के तगादे से बचने के लिए मील-दो-मील का चक्कर लगाकर घर लौटते रहे?

चक्कर लगाने से जूता फटता नहीं, घिस जाता है।

कुम्भनदास का जूता भी फतेहपुर सीकरी जाने-आने में घिस गया था। उसे बड़ा पछतावा हुआ। उसने कहा-

‘आवत जात पन्हैया घिस गयी, बिसर गयो हरी नाम।’

और ऐसे बुलाकर देनेवालों के लिए कहा गया था-- ‘जिनके देखे दुःख उपजत है, तिनकों करबो परै सलाम!’ चलने से जूता घिसता है, फटता नहीं है। तुम्हारा जूता कैसे फट गया?

मुझे लगता है, तुम किसी सख्त चीज को ठोकर मारते रहे हो। कोई चीज जो परत-दर-परत सदियों से जमती गयी है, उसे शायद तुमने ठोकर मार-मारकर अपना जूता फाड़ लिया। कोई टीला जो रास्ते पर खड़ा हो गया था, उस पर तुमने अपना जूता आजमाया।

तुम उसे बचाकर, उसके बगल से भी तो निकल सकते थे। टीलों से समझौता भी तो हो जाता है। सभी नदियाँ पहाड़ थोड़े ही फोड़ती हैं, कोई रास्ता बदलकर, घूमकर भी तो चली जाती है।

तुम समझौता कर नहीं सके। क्या तुम्हारी भी वही कमजोरी थी, जो होरी को ले डूबी, वही ‘नेम-धरम’ वाली कमजोरी? ‘नेम-धरम’ उसकी भी जंजीर थी। मगर तुम जिस तरह मुस्कुरा रहे हो, उससे लगता है कि शायद ‘नेम-धरम’ तुम्हारा बन्धन नहीं था, तुम्हारी मुक्ति थी।

तुम्हारी यह पाँव की अँगुली मुझे संकेत करती सी लगती है, जिसे तुम घृणित समझते हो, उसकी तरफ हाथ की नहीं, पांव की अंगुली से इशारा करते हो?

तुम क्या उसकी तरफ इशारा कर रहे हो, जिसे ठोकर मारते-मारते तुमने जूता फाड़ लिया?

मैं समझता हूँ। तुम्हारी अँगुली का इशारा भी समझता हूँ और यह व्यंग्य-मुस्कान भी समझता हूँ।

तुम मुझ पर या हम सभी पर हँस रहे हो। उन पर जो अँगुली छिपाये और तलुआ घिसाये चल रहे हैं, उन पर जो टीले को बचाकर बाजू से निकल रहे हैं। तुम कह रहे हो-- मैंने तो ठोकर मार-मारकर जूता फाड़ लिया, अँगुली बाहर निकल आयी, पर पाँव बच रहा और मैं चलता रहा, मगर तुम अँगुली को ढाँकने की चिन्ता में तलुवे का
नाश कर रहे हो। तुम चलोगे कैसे?

मैं समझता हूँ। मैं तुम्हारे फटे जूते की बात समझता हूँ, अँगुली का इशारा समझता हूँ  तुम्हारी व्यंग्य-मुस्कान समझता हूँ।








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