पगड़ी सम्भाल जट्टा - शहीद फिल्म


पगड़ी सम्भाल जट्टा

पगड़ी सम्भाल ओए 

पगड़ी सम्भाल जट्टा

लुट गया माल ओए 


तू धरती की माँग सँवारे सोये खेत जगाये

सारे जग का पेट भरे तू अन्नदाता कहलाये

फिर क्यों भूख तुझे खाती है और तू भूख को खाये

लुट गया माल तेरा, लुट गया माल ओए 

पगड़ी सम्भाल जट्टा 


देके अपना खून पसीना तूने फ़सल उगायी

आँधी देखी तूफ़ाँ झेले बिपदा सभी उठायी

फ़सल कटी तो ले गये ज़ालिम तेरी नेक कमायी

लुट गया माल तेरा लुट गया माल ओए 

पगड़ी सम्भाल जट्टा


उठ और उठ के खाक़ से ज़र्रे एक सितारा बन जा

बुझा बुझा क्यों दिल है तेरा इक अंगारा बन जा

ओ सदियों के ठहरे पानी बहती धारा बन जा

लुट गया माल तेरा लुट गया माल ओए 

पगड़ी सम्भाल जट्टा

हम लड़ेंगे साथी

हम लड़ेंगे साथी, उदास मौसम के लिए

हम लड़ेंगे साथी,ग़ुलाम इच्छाओं के लिए

हम चुनेंगे साथी, ज़िन्दगी के टुकड़े


हथौड़ा अब भी चलता है, उदास निहाई पर

हल अब भी चलता हैं चीख़ती धरती पर

यह काम हमारा नहीं बनता है, सवाल नाचता है

सवाल के कन्धों पर चढ़कर

हम लड़ेंगे साथी


क़त्ल हुए जज़्बों की क़सम खाकर

बुझी हुई नज़रों की क़सम खाकर

हाथों पर पड़े गाँठों की क़सम खाकर

हम लड़ेंगे साथी


हम लड़ेंगे तब तक

जब तक वीरू बकरिहा

बकरियों का पेशाब पीता है

खिले हुए सरसों के फूल को

जब तक बोने वाले ख़ुद नहीं सूँघते

कि सूजी आँखों वाली

गाँव की अध्यापिका का पति जब तक

युद्ध से लौट नहीं आता


जब तक पुलिस के सिपाही

अपने भाइयों का गला घोंटने को मज़बूर हैं

कि दफ़्तरों के बाबू

जब तक लिखते हैं लहू से अक्षर

हम लड़ेंगे जब तक

दुनिया में लड़ने की ज़रूरत बाक़ी है


जब बन्दूक न हुई, तब तलवार होगी

जब तलवार न हुई, लड़ने की लगन होगी

लड़ने का ढंग न हुआ, लड़ने की ज़रूरत होगी


और हम लड़ेंगे साथी

हम लड़ेंगे

कि लड़े बग़ैर कुछ नहीं मिलता

हम लड़ेंगे

कि अब तक लड़े क्यों नहीं

हम लड़ेंगे

अपनी सज़ा कबूलने के लिए

लड़ते हुए मर जाने वाले की

याद ज़िन्दा रखने के लिए

हम लड़ेंगे

हम मेहनतकश जग वालों से जब अपना हिस्‍सा मांगेंगे

हम मेहनतकश जग वालों से जब अपना हिस्‍सा मांगेंगे

हम मेहनतकश जग वालों से जब अपना हिस्‍सा मांगेंगे

इक खेत नहीं, इक देश नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे।


ये पर्वत-पर्वत हीरे हैं, ये सागर-सागर मोती हैं। 

ये सारा माल हमारा है, हम सारा खजाना मांगेंगे।


वो सेठ व्‍यापारी रजवारे, दस लाख तो हम हैं दस करोड। 

ये कब तक अमरीका से, जीने का सहारा मांगेंगे।


जो खून बहे जो बाग उजडे जो गीत दिलों में कत्‍ल हुए,

हर कतरे का हर गुंचे का, हर गीत का बदला मांगेंगे।


जब सब सीधा हो जाएगाए जब सब झगडे मिट जायेंगेए

हम मेहनत से उपजायेंगेए बस बांट बराबर खायेंगे।


हम मेहनतकश जग वालों से जब अपना हिस्‍सा मांगेंगे। 

इक खेत नहीं, इक देश नही, हम सारी दुनिया मांगेंगे।

आज बाज़ार में पा-ब-जौलाँ चलो

चश्म-नम जान-ए-शोरीदा काफ़ी नहीं 

तोहमत-ए-इश्क़-ए-पोशीदा काफ़ी नहीं 

आज बाज़ार में पा-ब-जौलाँ चलो 

दस्त-अफ़्शाँ चलो मस्त ओ रक़्साँ चलो 

ख़ाक-बर-सर चलो ख़ूँ-ब-दामाँ चलो 

राह तकता है सब शहर-ए-जानाँ चलो 

हाकिम-ए-शहर भी मजमा-ए-आम भी 

तीर-ए-इल्ज़ाम भी संग-ए-दुश्नाम भी 

सुब्ह-ए-नाशाद भी रोज़-ए-नाकाम भी 

उन का दम-साज़ अपने सिवा कौन है 

शहर-ए-जानाँ में अब बा-सफ़ा कौन है 

दस्त-ए-क़ातिल के शायाँ रहा कौन है 

रख़्त-ए-दिल बाँध लो दिल-फ़िगारो चलो 

फिर हमीं क़त्ल हो आएँ यारो चलो 

निसार मैं तिरी गलियों के

निसार मैं तिरी गलियों के ऐ वतन कि जहाँ 

चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले 

जो कोई चाहने वाला तवाफ़ को निकले 

नज़र चुरा के चले जिस्म ओ जाँ बचा के चले 

है अहल-ए-दिल के लिए अब ये नज़्म-ए-बस्त-ओ-कुशाद 

कि संग-ओ-ख़िश्त मुक़य्यद हैं और सग आज़ाद 

बहुत है ज़ुल्म के दस्त-ए-बहाना-जू के लिए 

जो चंद अहल-ए-जुनूँ तेरे नाम.लेवा हैं 

बने हैं अहल-ए-हवस मुद्दई भी मुंसिफ़ भी 

किसे वकील करें किस से मुंसिफ़ी चाहें 

मगर गुज़ारने वालों के दिन गुज़रते हैं 

तिरे फ़िराक़ में यूँ सुब्ह ओ शाम करते हैं 

बुझा जो रौज़न-ए-ज़िंदाँ तो दिल ये समझा है 

कि तेरी माँग सितारों से भर गई होगी 

चमक उठे हैं सलासिल तो हम ने जाना है 

कि अब सहर तिरे रुख़ पर बिखर गई होगी 

ग़रज़ तसव्वुर-ए-शाम-ओ-सहर में जीते हैं 

गिरफ़्त-ए-साया-ए-दीवार-ओ-दर में जीते हैं 

यूँही हमेशा उलझती रही है ज़ुल्म से ख़ल्क़ 

न उन की रस्म नई है न अपनी रीत नई 

यूँही हमेशा खिलाए हैं हम ने आग में फूल 

न उन की हार नई है न अपनी जीत नई 

इसी सबब से फ़लक का गिला नहीं करते 

तिरे फ़िराक़ में हम दिल बुरा नहीं करते 

गर आज तुझ से जुदा हैं तो कल बहम होंगे 

ये रात भर की जुदाई तो कोई बात नहीं 

गर आज औज पे है ताला-ए-रक़ीब तो क्या 

ये चार दिन की ख़ुदाई तो कोई बात नहीं 

जो तुझ से अहद-ए-वफ़ा उस्तुवार रखते हैं 

इलाज-ए-गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार रखते हैं