सदा आ रही है मरे दिल से पैहम - हबीब जालिब

सदा आ रही है मरे दिल से पैहम 


सदा आ रही है मरे दिल से पैहम 

कि होगा हर इक दुश्मन-ए-जाँ का सर ख़म 

नहीं है निज़ाम-ए-हलाकत में कुछ दम 

ज़रूरत है इंसान की अम्न-ए-आलम 

फ़ज़ाओं में लहराएगा सुर्ख़ परचम 

सदा आ रही है मिरे दिल से पैहम 

न ज़िल्लत के साए में बच्चे पलेंगे 

न हाथ अपने क़िस्मत के हाथों मलेंगे 

मुसावात के दीप घर घर जलेंगे 

सब अहल-ए-वतन सर उठा के चलेंगे 

न होगी कभी ज़िंदगी वक़्फ़-ए-मातम 

फ़ज़ाओं में लहराएगा सुर्ख़ परचम 

कब याद में तेरा साथ नहीं कब हात में तेरा हात नहीं

कब याद में तेरा साथ नहीं कब हात में तेरा हात नहीं 

सद-शुक्र कि अपनी रातों में अब हिज्र की कोई रात नहीं 

मुश्किल हैं अगर हालात वहाँ दिल बेच आएँ जाँ दे आएँ 

दिल वालो कूचा-ए-जानाँ में क्या ऐसे भी हालात नहीं 

जिस धज से कोई मक़्तल में गया वो शान सलामत रहती है 

ये जान तो आनी जानी है इस जाँ की तो कोई बात नहीं 

मैदान-ए-वफ़ा दरबार नहीं याँ नाम-ओ-नसब की पूछ कहाँ 

आशिक़ तो किसी का नाम नहीं कुछ इश्क़ किसी की ज़ात नहीं 

गर बाज़ी इश्क़ की बाज़ी है जो चाहो लगा दो डर कैसा 

गर जीत गए तो क्या कहना हारे भी तो बाज़ी मात नहीं 


बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे 

बोल ज़बाँ अब तक तेरी है 

तेरा सुत्वाँ जिस्म है तेरा 

बोल कि जाँ अब तक तेरी है 

देख कि आहन-गर की दुकाँ में 

तुंद हैं शोले सुर्ख़ है आहन 

खुलने लगे क़ुफ़्लों के दहाने 

फैला हर इक ज़ंजीर का दामन 

बोल ये थोड़ा वक़्त बहुत है 

जिस्म ओ ज़बाँ की मौत से पहले 

बोल कि सच ज़िंदा है अब तक 

बोल जो कुछ कहना है कह ले 

वो सुब्ह कभी तो आएगी - साहिर लुधियानवी

वो सुब्ह कभी तो आएगी - साहिर लुधियानवी 


इन काली सदियों के सर से जब रात का आँचल ढलकेगा 
जब दुख के बादल पिघलेंगे जब सुख का सागर छलकेगा 
जब अम्बर झूम के नाचेगा जब धरती नग़्मे गाएगी 
वो सुब्ह कभी तो आएगी 

जिस सुब्ह की ख़ातिर जग जग से हम सब मर मर कर जीते हैं 
जिस सुब्ह के अमृत की धुन में हम ज़हर के प्याले पीते हैं 
इन भूकी प्यासी रूहों पर इक दिन तो करम फ़रमाएगी 
वो सुब्ह कभी तो आएगी 

माना कि अभी तेरे मेरे अरमानों की क़ीमत कुछ भी नहीं 
मिट्टी का भी है कुछ मोल मगर इंसानों की क़ीमत कुछ भी नहीं 
इंसानों की इज़्ज़त जब झूटे सिक्कों में न तोली जाएगी 
वो सुब्ह कभी तो आएगी 

दौलत के लिए जब औरत की इस्मत को न बेचा जाएगा 
चाहत को न कुचला जाएगा ग़ैरत को न बेचा जाएगा 
अपने काले करतूतों पर जब ये दुनिया शरमाएगी 
वो सुब्ह कभी तो आएगी 

बीतेंगे कभी तो दिन आख़िर ये भूक के और बेकारी के 
टूटेंगे कभी तो बुत आख़िर दौलत की इजारा-दारी के 
जब एक अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाए जाएगी 
वो सुब्ह कभी तो आएगी 

मजबूर बुढ़ापा जब सूनी राहों की धूल न फाँकेगा 
माश्सूम लड़कपन जब गंदी गलियों में भीक न माँगेगा 
हक़ माँगने वालों को जिस दिन सूली न दिखाई जाएगी 
वो सुबह कभी तो आएगी 

फ़ाक़ों की चिताओं पर जिस दिन इंसाँ न जलाए जाएँगे 
सीने के दहकते दोज़ख़ में अरमाँ न जलाए जाएँगे 
ये नरक से भी गंदी दुनिया जब स्वर्ग बताई जाएगी 
वो सुब्ह कभी तो आएगी 

जब धरती करवट बदलेगी जब क़ैद से क़ैदी छूटेंगे 
जब पाप घरौंदे फूटेंगे जब ज़ुल्म के बंधन टूटेंगे 
उस सुब्ह को हम ही लाएँगे वो सुब्ह हमीं से आएगी 
वो सुब्ह हमीं से आएगी 

मनहूस समाजी ढाँचों में जब ज़ुल्म न पाले जाएँगे 
जब हाथ न काटे जाएँगे जब सर न उछाले जाएँगे 
जेलों के बिना जब दुनिया की सरकार चलाई जाएगी 
वो सुब्ह हमीं से आएगी 

संसार के सारे मेहनत-कश खेतों से मिलों से निकलेंगे 
बे-घर बे-दर बे-बस इंसाँ तारीक बिलों से निकलेंगे 
दुनिया अम्न और ख़ुश-हाली के फूलों से सजाई जाएगी 
वो सुब्ह हमीं से आएगी 


ये किस का लहू है कौन मरा

ये किस का लहू है कौन मरा 


धरती की सुलगती छाती से बेचैन शरारे पूछते हैं 

तुम लोग जिन्हें अपना न सके वो ख़ून के धारे पूछते हैं 

सड़कों की ज़बाँ चिल्लाती है सागर के किनारे पूछते हैं 

ये किस का लहू है कौन मरा ऐ रहबर-ए-मुलक-ओ-क़ौम बता 


ये जलते हुए घर किस के हैं ये कटते हुए तन किस के हैं 

तक़्सीम के अंदर तूफ़ाँ में लुटते हुए गुलशन किस के हैं 

बद-बख़्त फ़ज़ाएँ किस की हैं बरबाद नशेमन किस के हैं 

कुछ हम भी सुनें हम को भी सुना 


किस काम के हैं ये दीन-धर्म जो शर्म का दामन चाक करें 

किस तरह के हैं ये देश-भगत जो बस्ते घरों को ख़ाक करें 

ये रूहें कैसी रूहें हैं जो धरती को नापाक करें 

आँखें तो उठा नज़रें तो मिला 


जिस राम के नाम पे ख़ून बहे उस राम की इज़्ज़त क्या होगी 

जिस दीन के हाथों लाज लुटे इस दीन की क़ीमत क्या होगी 

इंसान की इस ज़िल्लत से परे शैतान की ज़िल्लत क्या होगी 

ये वेद हटा क़ुरआन उठा 

ये किस का कहो है कौन मिरा 

ये किस का लहू है कौन मरा ऐ रहबर-ए-मुलक-ओ-क़ौम बता