रउरा सासन के बाटे

रउरा सासन के बाटे 

रउरा सासन के बाटे ना जवाब भाई जी,

रउरा कुरसी से झरेला गुलाब भाई जी। 


रउरा भोंभा लेके सगरों आवाज करीला,

हमारा मुंहवा में लागल बाटे जाब भाई जी। 


रउरे बुढ़िया के गलवा में क्रीम लागेला,

हमरी नइकी के जरि गइले भाग भाई जी। 


रउरे लरिका त पढ़ेला बिलाईत जाई के,

हमरे लरिका के जुरे ना किताब भाई जी। 


हमरे लरिका के रोटिया पर नून नइखे,

रउरा चांपीं  रोज मुरगा कबाब भाई जी। 


रउरे अंगुरी पर पुलिस आऊर थाना नाचे ले,

हमरे मुअले के होखे न हिसाब भाई जी। 







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पढना-लिखना सीखो

पढना-लिखना सीखो -

पढना-लिखना सीखो ओ मेहनत करने वालो
पढना-लिखना सीखो ओ भूख से मरने वालो

क ख ग घ को पहचानो
अलिफ़ को पढना सीखो,
अ आ इ ई को हथियार
बनाकर लड़ना सीखो

ओ सडक बनाने वालो, ओ भवन उठाने वालो
खुद अपनी किस्‍मत का फैसला अगर तुम्‍हें करना है
ओ बोझा ढोने वालो, ओ रेल चलाने वालो
अगर देश की बागडोर को कब्‍जे में करना है

क ख ग घ को पहचानो
अलिफ को पढना सीखो,
अ आ इ ई को हथियार
बनाकर लड़ना सीखो

पूछो मजदूरी की खातिर लोग भटकते क्‍यों हैं ?
पढो, तुम्‍हारी सूखी रोटी गिद्ध लपकते क्‍यों हैं ?
पूछो, मां-बहनों पर यों बदमाश झपटते क्‍यों हैं ?
पढो, तुम्‍हारी मेहनत का फल सेठ गटकते क्‍यों हैं ?

पढो, लिखा है दीवारों पर महनतकश का नारा
पढो, पोस्‍टर क्‍या कहता है, वो भी दोस्‍त तुम्‍हारा
पढो, अगर अंधे विश्‍वासों से पाना छुटकारा
पढो, किताबें कहती हैं - सारा संसार तुम्‍हारा
पढो, कि हर मेहनतकश को उसका हक़ दिलवाना है
पढो, अगर इस देश को अपने ढंग से चलवाना है

क ख ग घ को पहचानो
अलिफ को पढना सीखो,
अ आ इ ई को हथियार
बनाकर लड़ना सीखो


                                   -सफदर हाशमी






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सदा आ रही है मरे दिल से पैहम - हबीब जालिब

सदा आ रही है मरे दिल से पैहम 


सदा आ रही है मरे दिल से पैहम 

कि होगा हर इक दुश्मन-ए-जाँ का सर ख़म 

नहीं है निज़ाम-ए-हलाकत में कुछ दम 

ज़रूरत है इंसान की अम्न-ए-आलम 

फ़ज़ाओं में लहराएगा सुर्ख़ परचम 

सदा आ रही है मिरे दिल से पैहम 

न ज़िल्लत के साए में बच्चे पलेंगे 

न हाथ अपने क़िस्मत के हाथों मलेंगे 

मुसावात के दीप घर घर जलेंगे 

सब अहल-ए-वतन सर उठा के चलेंगे 

न होगी कभी ज़िंदगी वक़्फ़-ए-मातम 

फ़ज़ाओं में लहराएगा सुर्ख़ परचम 

कब याद में तेरा साथ नहीं कब हात में तेरा हात नहीं

कब याद में तेरा साथ नहीं कब हात में तेरा हात नहीं 

सद-शुक्र कि अपनी रातों में अब हिज्र की कोई रात नहीं 

मुश्किल हैं अगर हालात वहाँ दिल बेच आएँ जाँ दे आएँ 

दिल वालो कूचा-ए-जानाँ में क्या ऐसे भी हालात नहीं 

जिस धज से कोई मक़्तल में गया वो शान सलामत रहती है 

ये जान तो आनी जानी है इस जाँ की तो कोई बात नहीं 

मैदान-ए-वफ़ा दरबार नहीं याँ नाम-ओ-नसब की पूछ कहाँ 

आशिक़ तो किसी का नाम नहीं कुछ इश्क़ किसी की ज़ात नहीं 

गर बाज़ी इश्क़ की बाज़ी है जो चाहो लगा दो डर कैसा 

गर जीत गए तो क्या कहना हारे भी तो बाज़ी मात नहीं 


बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे

बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे 

बोल ज़बाँ अब तक तेरी है 

तेरा सुत्वाँ जिस्म है तेरा 

बोल कि जाँ अब तक तेरी है 

देख कि आहन-गर की दुकाँ में 

तुंद हैं शोले सुर्ख़ है आहन 

खुलने लगे क़ुफ़्लों के दहाने 

फैला हर इक ज़ंजीर का दामन 

बोल ये थोड़ा वक़्त बहुत है 

जिस्म ओ ज़बाँ की मौत से पहले 

बोल कि सच ज़िंदा है अब तक 

बोल जो कुछ कहना है कह ले